Tuesday, 27 May 2014

रास्ता …


रास्ता

यु ही चलते चलते रास्ते पे
कहा आ गये पता नही
हर मोड पर जहां मन्जिल बदल रही थी
ऐसे ही कोई रास्ते पे चल पड़ा था मै


हर राह पर नए साथी मिलते गये
जब मोड़ आया तो साथी भी  बदल गए
कुछ साथी थोड़ी दूर तक चले
पर पता नहीं अभी कहाँ खो गए है


चलते चलते इतना दूर आ गया हु'
समज़ नहीं आ रहा शुरुवात कहाँ की थी
ये शुरुवात के साथियों ने भी
न जाने कौनसे मोड़ ले लिए


अभी सोचता हु रुक जाऊ इस मोड़ पे
एक बार देख लू पीछे मूड  के
पर कोई नज़र नहीं आ रहा
शायद सब चले गए है
अपने अपने रास्ते पे
पर किसीको याद नही


अपने साथी फिर ये मोड़ पे बदल जायेंगे
न जाने वो पुराने साथी किस मोड़ पर मिलेंगे
एक मोड़ ऐसा भी हो
जहां ये सब फिरसे मिले
पर वो मोड़ की चक्कर में
मंजिल से ना भटक जाऊ


ऐसा ही है  रास्ता सा
किस मोड़ पर कौन मिल जाये क्या पता?

1 comment:

  1. Beautiful poem with deep thoughts & great wordings.... Awesome. All the best & waiting for many new blogs.

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